पांचवां और अंतिम चैत्यवंदन शीर्ष पर स्थित आदिनाथ भगवान (प्रथम तीर्थंकर) के मंदिर में होता है。 आदिनाथ भगवान जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर हैं और यह मंदिर शत्रुंजय पर्वत की यात्रा का चरम बिंदु माना जाता है। प्रार्थना: "आदिदेव अलवेसरु, विनितानो राय; नाभिराया कुल मंडणो, मरुदेवा माय। पांचशे धनुषनी देहडी, प्रभुजी परम दयाळ, चोराशी लख पूर्व तणु, जस आयु विशाल।"। यह चैत्यवंदन यात्रा की सफलता और मोक्ष प्राप्ति के संकल्प के साथ संपन्न होता है।
यदि आप इस साधना को और गहरा करना चाहते हैं, तो मुझे बताएं:
मुख्य जिनालय के बाहर स्थित रायण वृक्ष के नीचे भगवान आदिनाथ के चरण पादुका (पगला) हैं। यहाँ बैठकर चैत्यवंदन करने का अनंत गुना फल मिलता है। palitana 5 chaityavandan in hindi full
शत्रुंजय मणिशेखर सोहे, नाभिराया कुल चंदा।मरुदेवा माता कुखे उपन्या, जगत तणा दुख भंदा॥ १ ॥प्रथम जिनेश्वर त्रिभुवन स्वामी, आदिनाथ भगवंत।शत्रुंजय गिरिराजना नायक, गुण जेहना अनंत॥ २ ॥नववाणूं वार प्रभु ए गिरि आव्या, पुरव नवाणूं सार।तेहना चरणकमल जे वंदे, ते पावे भव पार॥ ३ ॥सेव सेवा प्रभु तोरी पाशें, मांगूं जोड़ हाता।'कल्याणविजय' कहे आदि जिनेश्वर, दीजे शिवसुख साता॥ ४ ॥
Shree Shantrunjay giriraj Yatra Five Chaityavandans - jainsite नाभिराया कुल मंडणो
यात्रा की शुरुआत में ही स्नानादि कर स्वच्छ, धुले हुए सूती (खादी) या पूजनीय वस्त्र धारण करें।
पुंडरीक मंडन पाय प्रणमी जे,आदिनाथ जिणचंदजी;नेम विना चोवीस वंदूं,गिरि चढ्या आनंदजी।आगम मांहि पुंडरीक महिमा,भाख्यो ज्ञान दिवाणजी;चैत्री पूनम दिन देवी चक्केसरी,सौभाग्य द्यो सुखकंदजी। प्रभुजी परम दयाळ
४. चतुर्थ चैत्यवंदन: श्री पुंडरीक स्वामी चैत्यवंदन
प्रत्येक चैत्यवंदन के पाठ के बाद नवकार मंत्र का गिनकर काउसग्ग (ध्यान) अवश्य करें। निष्कर्ष
5. पंचम चैत्यवंदन: सकल सिद्ध और सर्व जिनालय
: जगभर के चैत्यों को वंदन।